चीन की जहरीली कचरा जलाने की तकनीक से बिजली बनाने पर रोक की मांग
ओखला, नरेला-बवाना और गाजीपुर में कचरा आधारित बिजली घर सुरिम कोर्ट की अवमाननाकेंद्रीय प्रदुषण नियंत्रण आयोग जिंदल एकोपोलिस कम्पनी के अधिकारियों भर्त्सना की, औद्योगिक त्रासदी प्लान नदारद
बिना किसी तकीनी जांच के और पर्यावरण सम्बन्धी मंजूरी के चीन की कचरा जला के बिजली बनाने वाली तकनीकि की बदौलत दिल्ली के ओखला में जो बिजली घर है वह डाईआक्सीन का उत्सर्जन कर रही है. ऐसी तकनीकि के दुष्प्रभाव से अनजान दिल्ली वासियों के रिहायसी इलाके में इसका प्रयोग किया जा रहा है. इसका खुलासा केंद्रीय प्रदुषण नियंत्रण आयोग के एक रिपोर्ट से हुआ है जिसे मार्च २२, २०१२ को सामने लाया गया. इस रिपोर्ट से यह भी पता चलता है की कचरा आधारित बिजली घर से होने वाली त्रासदी के लिए कोई तैयारी भी नहीं है. केंद्रीय प्रदुषण नियंत्रण आयोग ओखला बिजली घर के जिंदल एकोपोलिस कम्पनी के अधिकारियों कड़ी आलोचना की है मगर इस रिपोर्ट का ऐसे समय में आना जब जनवरी महीने से कचरा आधारित बिजली कारखाना शुरू चूका है गंभीर सवाल खरे करता है.
ऐसा ही बिजली घर दिल्ली के नरेला-बवाना और गाजीपुर में निर्माणाधीन है. डाईआक्सीन कैंसर के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक प्रदुषणकारी रसायन है. कचरे में मौजूद खतरनाक रसायनों को यह तकनीकि कई-कई रूपों में वायु प्रदुषण, जल प्रदुषण और भोजन चक्र का हिस्सा बना देता है. अब यह जहर केवल धरती या पानी में ही नहीं बल्कि हवा में भी तैरने लगता है. शहर के कूड़े में प्लास्टिक के अलावा पारा भी बहुतायत में निकलता हैं. पर्यावरण मंत्रालय के अपने श्वेत पत्र में यह बात स्वीकार की गयी है कि जिस तरीके से शहरी कूड़े को जलाया जा जा रहा था वह तकनीकि सही नहीं थी. अब वह सही कैसे हो गया.
दिल्ली के ओखला में २०५० मेट्रिक टन कूड़े से २० MW बिजली का कारखाना के अलावा नरेला-बवाना में ४००० मेट्रिक टन/३६ MW का और गाजीपुर में १३०० मेट्रिक टन/१० MW के कारखाने का निर्माण जारी है. सरकार दिल्ली में ३ कचरा से बिजली बनाने के परियोजना को लागु कर रही है जिससे पर्यावरण और स्वस्थ्य को भारी मात्रा में नुकसान होता है और यह कचरा पर आधारित रोजगार को ख़तम कर देता है. दिल्ली लगभग 80% एरिया के काम को प्राइवेट कम्पनी के हाथों बेच दिया गया है लेकिन उसके बावजूद भी समस्या का हल नहीं हो पा रहा है दिल्ली में कचरे क़ि छंटाई के काम में असंगठित क्षेत्र के लगभग 3.5 लाख मजदूर शामिल है. कचरे का लगभग 20 से 25 प्रतिशत क़ि छंटाई हो जाती है. इनके द्वारा 30% कचरे क़ि छंटाई हो जाएगी जो कच्चे माल के रूप में दुबारा इस्तेमाल होगा और साथ ही 50% वैसा कचरा है जिसको जैविक कूड़ा कहते है उससे खाद बनाया जा सकता है. 80% भाग को समुदाय स्तर पर ही निपटारा हो सकता है.
ऐसे बिजलीघर न तो कूड़ा निपटाने के लिए बनते हैं और न ही बिजली पैदा करने के लिए. कारण कुछ और हैं. इन कारणों में एक कारण यह भी है कि प्रति मेगावाट की दर से केंद्र सरकार डेढ़ करोड़ का अनुदान देती है. सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी योज्नावो को अनुदान देने पर रोक लगा रखा है. मगर कोर्ट के आदेश का खुलेआम उलंघन कर इस योजना पर कार्य जारी है.
सभी विकसित देशों ने ऐसी परियोजना को बंद कर चुकि है इसके मूल कारण रहे है क़ि इससे जहरीली गैस निकलती है जो जीवन व पर्यावरण के लिए काफी खतरनाक है और कचरे में वैसी जलने क़ि क्षमता नहीं है जिससे बिजली का उत्पादन किया जा सकता है भारत में पहली बार दिल्ली के तिमारपुर में कचरा से बिजली बनाने क़ि परियोजना 1990 में लगाया गया जो असफल रहा.
For Details: Gopal Krishna, Convener, ToxicsWatch Alliance (TWA), Mb: 9818089660, Email: krishna1715@gmail.com, Web: toxicswatch.blogspot.com, Shashi Bhushan Pandit, All India Kabadi Mazdoor Mahasangh (AIKMM), Mb: 9968413109, Asha Arora, Okhla Anti-incinerator Committee, http://www.facebook.com/home.php#!/ghoslaokhla
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